मंगलवार, 6 अप्रैल 2010
सोमवार, 5 अप्रैल 2010
रविवार, 4 अप्रैल 2010
gitaa,,,,गीता,,,,,,,
गीता को लोग इतना महत्वपूर्ण क्यों मानते हैं? असल में इस एक ही ग्रंथ के अनेक पहलू हैं। यह प्रत्येक समाज के लिए एक
पृथक समाज शास्त्र है, तो राजनायिकों के लिए 'राजनीति शास्त्र। यह संतों, महात्माओं, ज्ञानियों व जिज्ञासुओं के लिए अध्यात्म का ग्रंथ है। भक्तों के लिए भक्ति मार्ग का निर्देशक। और पूंजीवाद, समाजवाद तथा साम्यवाद जैसी व्यवस्थाओं के लिए नीति सूत्रों का संकलन। इसीलिए यह एक ज्ञान वर्दक ग्रन्थ बन गया। इसीलिए पश्चिमी देशों के विद्वान भी मुक्त कंठ से इसकी प्रशंसा करते हैं। यह ग्रंथ गुरु- शिष्य की परंपरा पर आधारित नही है यदि ऐसा होता तो भगवान कृष्ण बड़े बड़े शूर वीरों और गुरु जनों को अर्जुन के हाथों ना मरवाते
गीता किसी संप्रदाय विशेष के लिए नहीं है, बल्कि संसार केसमस्तउन मनुष्यों के लिए है जो अपने जीवन को समझना चाहते हैं।इसमें चारों वर्णों के सर्व कालीन कर्म, ज्ञान तथा भक्ति योग के बारे में चर्चा है। इसके चौथे अध्याय में श्री कृष्ण कहते हैं कि संयत इन्द्रिय होकर ज्ञान प्राप्ति में लगा हुआ श्रद्धावान प्राणी ही ज्ञान प्राप्त करता है और परम शांति को प्राप्त होता है। आगे कहते हैं, तत्व को जानने वाले ज्ञानी पुरुषों से निष्कपट भाव से दंडवत प्रणाम तथा सेवा करके उस ज्ञान को जानना चाहिए।धरती पर जन्मे किसी भी गुरु या पुरुष को पूर्ण ज्ञान नही होता है ,तत्वज्ञानी होना तो बहुत दूर की बात होजाती है अरे मनुष्य तो यह भी नही जानता की वह शोचालय तक कितने कदम चल कर पहुंचा , दिली से गाज़िया बाद तक के रास्ते में कितने पेड़ आये !परमात्मा के पास एक दो नही पुरे ब्रह्मांड के जीवों का पूरा लेखा जोखा है ,अर्थात उन से बड़ा तत्व ज्ञानी ना कोई है और नाहोगा !
हम किताबें होते हुए भी पाठशाला जाते हैं विद्या अध्ययन के लिए, लेकिन इसी प्रकार गीता के इस आदेश का पालन नहीं कर पाते कि तत्वज्ञानी की शरण में जाकर 'ज्ञान' प्राप्त करें। इसी कारण हम उस 'ज्ञान' से प्राय: वंचित रह जाते हैं।
मनुष्य को सत् और असत् का भेद बताने वाली गीता का उद्भव वन में स्थिति किसी निर्जन आश्रम में किसी आचार्य द्वारा दिए गए उपदेश से नहीं जोड़ें । न यह हिमालय की कंदराओं में बैठे किसी तपस्वी की वाणी से फूटा। और न ही यह किसी गुरुकुल में दीक्षा देने वाले किसी कुलपति का भाषण है, बल्कि यह तो युद्घ के मैदान में दो विरोधी सेनाओं के बीच खड़े हो कर दिया गया उपदेश है। इस तरह यह जीवन सागर के पार उतरने के लिए कर्म ज्ञान है।
निष्काम कर्म का संदेशवाहक गीता 'फल की प्राप्ति की कामना नहीं करने की बात कह कर अनासक्ति की ओर ले जाती है। कृष्ण कहते हैं, न तो कभी अपने आपको अपने कर्मों के फलों का कारण मानो, न ही कर्म न करने में कभी आसक्ति हो।
वे कर्म करने को कहते हैं। अकर्मण्य की तरह बैठने से मना करते हैं और अपना कर्त्तव्य पूरा करने को कहते हैं। वे कहते हैं, सुख-दुख, जय-पराजय, हानि-लाभ का विचार किए बिना युद्ध के लिए युद्ध करो अर्थात कर्म के लिए कर्म करो। ऐसा करने से कोई पाप नहीं लगेगा। यह है जीवन-समर का सत्य जिसे हमें हृदयंगम करना चाहिए।
और अंत में तो, कुछ भी यदि समझ में नहीं आता हो तो एक बहुत ही सरल व सहज बात कह दी श्रीकृष्ण ने - ढेर सारे धर्म हैं, कर्त्तव्य हैं, फर्ज हैं -इन सभी का परित्याग करके मेरी शरणागत हो जाओ। यह भक्ति का मूल दर्शन है। यानी ज्ञान मार्गी के लिए ज्ञान और भक्ति मार्गी के लिए समर्पण का सूत्र। कर्म मार्गी के लिए संघर्ष और कर्त्तव्य का दर्शन और अध्यात्मवादी के लिए अनासक्ति का निर्देश।माता पिता,भाई बन्धु,सखा मित्र यही भगवान का प्रतिनिधित्व करते है ,त्वमेव माता पिता त्वमेव ,,,,,,,
इस प्रकार से गीता संपूर्ण जीवन का, उसके सभी पक्षों का मार्ग दर्शक है। अलग-अलग क्षेत्रों के विद्वानों ने इसकी अलग-अलग ढंग से अलग-अलग संदर्भों में व्याख्या की है। जैसे कहते हैं, 'ज्ञान बिना नर सोहहिं ऐसे, लवण बिना बहु व्यंजन जैसे' -उसी प्रकार गीता के ज्ञान के बिना हमारे ज्ञान में कुछ कमी रह जाती है।जिसे गीता ही पूर्ण कर पाती है ?
गीता किसी संप्रदाय विशेष के लिए नहीं है, बल्कि संसार केसमस्तउन मनुष्यों के लिए है जो अपने जीवन को समझना चाहते हैं।इसमें चारों वर्णों के सर्व कालीन कर्म, ज्ञान तथा भक्ति योग के बारे में चर्चा है। इसके चौथे अध्याय में श्री कृष्ण कहते हैं कि संयत इन्द्रिय होकर ज्ञान प्राप्ति में लगा हुआ श्रद्धावान प्राणी ही ज्ञान प्राप्त करता है और परम शांति को प्राप्त होता है। आगे कहते हैं, तत्व को जानने वाले ज्ञानी पुरुषों से निष्कपट भाव से दंडवत प्रणाम तथा सेवा करके उस ज्ञान को जानना चाहिए।धरती पर जन्मे किसी भी गुरु या पुरुष को पूर्ण ज्ञान नही होता है ,तत्वज्ञानी होना तो बहुत दूर की बात होजाती है अरे मनुष्य तो यह भी नही जानता की वह शोचालय तक कितने कदम चल कर पहुंचा , दिली से गाज़िया बाद तक के रास्ते में कितने पेड़ आये !परमात्मा के पास एक दो नही पुरे ब्रह्मांड के जीवों का पूरा लेखा जोखा है ,अर्थात उन से बड़ा तत्व ज्ञानी ना कोई है और नाहोगा !
हम किताबें होते हुए भी पाठशाला जाते हैं विद्या अध्ययन के लिए, लेकिन इसी प्रकार गीता के इस आदेश का पालन नहीं कर पाते कि तत्वज्ञानी की शरण में जाकर 'ज्ञान' प्राप्त करें। इसी कारण हम उस 'ज्ञान' से प्राय: वंचित रह जाते हैं।
मनुष्य को सत् और असत् का भेद बताने वाली गीता का उद्भव वन में स्थिति किसी निर्जन आश्रम में किसी आचार्य द्वारा दिए गए उपदेश से नहीं जोड़ें । न यह हिमालय की कंदराओं में बैठे किसी तपस्वी की वाणी से फूटा। और न ही यह किसी गुरुकुल में दीक्षा देने वाले किसी कुलपति का भाषण है, बल्कि यह तो युद्घ के मैदान में दो विरोधी सेनाओं के बीच खड़े हो कर दिया गया उपदेश है। इस तरह यह जीवन सागर के पार उतरने के लिए कर्म ज्ञान है।
निष्काम कर्म का संदेशवाहक गीता 'फल की प्राप्ति की कामना नहीं करने की बात कह कर अनासक्ति की ओर ले जाती है। कृष्ण कहते हैं, न तो कभी अपने आपको अपने कर्मों के फलों का कारण मानो, न ही कर्म न करने में कभी आसक्ति हो।
वे कर्म करने को कहते हैं। अकर्मण्य की तरह बैठने से मना करते हैं और अपना कर्त्तव्य पूरा करने को कहते हैं। वे कहते हैं, सुख-दुख, जय-पराजय, हानि-लाभ का विचार किए बिना युद्ध के लिए युद्ध करो अर्थात कर्म के लिए कर्म करो। ऐसा करने से कोई पाप नहीं लगेगा। यह है जीवन-समर का सत्य जिसे हमें हृदयंगम करना चाहिए।
और अंत में तो, कुछ भी यदि समझ में नहीं आता हो तो एक बहुत ही सरल व सहज बात कह दी श्रीकृष्ण ने - ढेर सारे धर्म हैं, कर्त्तव्य हैं, फर्ज हैं -इन सभी का परित्याग करके मेरी शरणागत हो जाओ। यह भक्ति का मूल दर्शन है। यानी ज्ञान मार्गी के लिए ज्ञान और भक्ति मार्गी के लिए समर्पण का सूत्र। कर्म मार्गी के लिए संघर्ष और कर्त्तव्य का दर्शन और अध्यात्मवादी के लिए अनासक्ति का निर्देश।माता पिता,भाई बन्धु,सखा मित्र यही भगवान का प्रतिनिधित्व करते है ,त्वमेव माता पिता त्वमेव ,,,,,,,
इस प्रकार से गीता संपूर्ण जीवन का, उसके सभी पक्षों का मार्ग दर्शक है। अलग-अलग क्षेत्रों के विद्वानों ने इसकी अलग-अलग ढंग से अलग-अलग संदर्भों में व्याख्या की है। जैसे कहते हैं, 'ज्ञान बिना नर सोहहिं ऐसे, लवण बिना बहु व्यंजन जैसे' -उसी प्रकार गीता के ज्ञान के बिना हमारे ज्ञान में कुछ कमी रह जाती है।जिसे गीता ही पूर्ण कर पाती है ?
शनिवार, 3 अप्रैल 2010
बुधवार, 31 मार्च 2010
मंगलवार, 30 मार्च 2010
शुक्रवार, 26 मार्च 2010
कबीर भगत कबीरदास - Kabirdas
कबीरदास - Kabirdas
कबीर के जन्म के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। कुछ लोगों के अनुसार वे रामानन्द स्वामी के आशीर्वाद से काशी की एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से पैदा हुए थे, जिसको भूल से रामानंद जी ने पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे दिया था। ब्राह्मणी उस नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास फेंक आयी।कबीर के माता- पिता के विषय में एक राय निश्चित नहीं है कि कबीर "नीमा' और "नीरु' की वास्तविक संतान थे या नीमा और नीरु ने केवल इनका पालन- पोषण ही किया था। कहा जाता है कि नीरु जुलाहे को यह बच्चा लहरतारा ताल पर पड़ा पाया, जिसे वह अपने घर ले आया और उसका पालन-पोषण किया। बाद में यही बालक कबीर कहलाया।
कबीर ने स्वयं को जुलाहे के रुप में प्रस्तुत किया है -
"जाति जुलाहा नाम कबीरा
बनि बनि फिरो उदासी।'
कबीर पन्थियों की मान्यता है कि कबीर की उत्पत्ति काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुई। ऐसा भी कहा जाता है कि कबीर जन्म से मुसलमान थे और युवावस्था में स्वामी रामानन्द के प्रभाव से उन्हें हिंदू धर्म का ज्ञान हुआ।पचता नही क्यों की यह भी कहा जाता है की एक दिन कबीर पञ्चगंगा घाट की सीढ़ियों पर गिर पड़े थे, रामानन्द जी उसी समय गंगास्नान करने के लिये सीढ़ियाँ उतर रहे थे कि उनका पैर कबीर के शरीर पर पड़ गया। उनके मुख से तत्काल `राम-राम' शब्द निकल पड़ा।यदि कबीर जी मुसलमान होते राम राम ना कहते इतना बड़ा ज्ञानी कबीर धर्म परिवर्तन की सोच ही नही सकता था ,और रामानन्द जी किसी का धर्म परिवर्तन नही करवा सकते थे .क्यों की शस्त्र आज्ञा ही एसिहे की दुसरे का धर्म कितनाभी उतम क्यों ना हो उसे देख कर अपना धर्म नही बदलना चाहिए ' उसी राम को कबीर ने दीक्षा-मन्त्र मान लिया और रामानन्द जी को अपना गुरु स्वीकार कर लिया। कबीर के ही शब्दों में- `हम कासी में प्रकट भये हैं, रामानन्द चेताये'। अन्य जनश्रुतियों से ज्ञात होता है कि कबीर ने हिंदु-मुसलमान का भेद मिटा कर हिंदू-भक्तों तथा मुसलमान फक़ीरों का सत्संग किया और दोनों की अच्छी बातों को आत्मसात कर लिया।
जनश्रुति के अनुसार कबीर के एक पुत्र कमल तथा पुत्री कमाली थी। इतने लोगों की परवरिश करने के लिये उन्हें अपने करघे पर काफी काम करना पड़ता था। साधु संतों का तो घर में जमावड़ा रहता ही था।
कबीर को कबीर पंथ में, बाल- ब्रह्मचारी और विराणी माना जाता है। इस पंथ के अनुसार कामात्य उसका शिष्य था और कमाली तथा लोई उनकी शिष्या। लोई शब्द का प्रयोग कबीर ने एक जगह कंबल के रुप में भी किया है। वस्तुतः कबीर की पत्नी और संतान दोनों थे। एक जगह लोई को पुकार कर कबीर कहते हैं :-
"कहत कबीर सुनहु रे लोई।
हरि बिन राखन हार न कोई।।'
कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे-
`मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।'
उन्होंने स्वयं ग्रंथ नहीं लिखे, मुँह से भाखे और उनके शिष्यों ने उसे लिख लिया। आप के समस्त विचारों में रामनाम की महिमा प्रतिध्वनित होती है। वे एक ही ईश्वर को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे। अवतार, मूर्त्ति, रोज़ा, ईद, मसजिद, मंदिर आदि को वे नहीं मानते थे।
कबीर के नाम से मिले ग्रंथों की संख्या भिन्न-भिन्न लेखों के अनुसार भिन्न-भिन्न है। एच.एच. विल्सन के अनुसार कबीर के नाम पर आठ ग्रंथ हैं। विशप जी.एच. वेस्टकॉट ने कबीर के ८४ ग्रंथों की सूची प्रस्तुत की तो रामदास गौड ने `हिंदुत्व' में ७१ पुस्तकें गिनायी हैं।
कबीर की वाणी का संग्रह `बीजक' के नाम से प्रसिद्ध है। इसके तीन भाग हैं- रमैनी, सबद और सारवी यह पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, अवधी, पूरबी, व्रजभाषा आदि कई भाषाओं की खिचड़ी है।इनको सिख पन्थ में इनकी वाणी को गुरु का द्र्जादियाग्या परन्तु कबीर जी को भगत का दर्जा मिला गुरु का दर्जा इन्होंने कभी नही स्वीकारा
कबीर परमात्मा को मित्र, माता, पिता और पति के रूप में देखते हैं। यही तो मनुष्य के सर्वाधिक निकट रहते हैं। वे कभी कहते हैं-
`हरिमोर पिउ, मैं राम की बहुरिया' तो कभी कहते हैं, `हरि जननी मैं बालक तोरा'
उस समय हिंदु जनता पर मुस्लिम आतंक का कहर छाया हुआ था। कबीर ने अपने पंथ को इस ढंग से सुनियोजित किया जिससे मुस्लिम मत की ओर झुकी हुई जनता सहज ही इनकी अनुयायी हो गयी। उन्होंने अपनी भाषा सरल और सुबोध रखी ताकि वह आम आदमी तक पहुँच सके। इससे दोनों सम्प्रदायों के परस्पर मिलन में सुविधा हुई। इनके पंथ मुसलमान-संस्कृति और गोभक्षण के विरोधी थे।
कबीर को शांतिमय जीवन प्रिय था और वे अहिंसा, सत्य, सदाचार आदि गुणों के प्रशंसक थे। अपनी सरलता, साधु स्वभाव तथा संत प्रवृत्ति के कारण आज विदेशों में भी उनका समादर हो रहा है।
कबीर का पूरा जीवन काशी में ही गुजरा, लेकिन वह मरने के समय मगहर चले गए थे। वह न चाहकर भी, मगहर गए थे। वृद्धावस्था में यश और कीर्त्ति की मार ने उन्हें बहुत कष्ट दिया। उसी हालत में उन्होंने बनारस छोड़ा और आत्मनिरीक्षण तथा आत्मपरीक्षण करने के लिये देश के विभिन्न भागों की यात्राएँ कीं। कबीर मगहर जाकर दु:खी थे:
"अबकहु राम कवन गति मोरी।
तजीले बनारस मति भई मोरी।।''
कहा जाता है कि कबीर के शत्रुओं ने उनको मगहर जाने के लिए मजबूर किया था। वे चाहते थे कि कबीर की मुक्ति न हो पाए, परंतु कबीर तो काशी मरन से नहीं, राम की भक्ति से मुक्ति पाना चाहते थे:
"जौ काशी तन तजै कबीरा
तो रामै कौन निहोटा।''
अपने यात्रा क्रम में ही वे कालिंजर जिले के पिथौराबाद शहर में पहुँचे। वहाँ रामकृष्ण का छोटा सा मन्दिर था। वहाँ के संत भगवान गोस्वामी जिज्ञासु साधक थे किंतु उनके तर्कों का अभी तक पूरी तरह समाधान नहीं हुआ था। संत कबीर से उनका विचार-विनिमय हुआ। कबीर की एक साखी ने उन के मन पर गहरा असर किया-"जौ काशी तन तजै कबीरा
तो रामै कौन निहोटा।''
`बन ते भागा बिहरे पड़ा, करहा अपनी बान।
करहा बेदन कासों कहे, को करहा को जान।।'
वन से भाग कर बहेलिये के द्वारा खोये हुए गड्ढे में गिरा हुआ हाथी अपनी व्यथा किस से कहे ?
सारांश यह कि धर्म की जिज्ञासा सें प्रेरित हो कर भगवान गोसाई अपना घर छोड़ कर बाहर तो निकल आये और हरिव्यासी सम्प्रदाय के गड्ढे में गिर कर अकेले निर्वासित हो कर ऐसी स्थिति में पड़ चुके हैं।
कबीर आडम्बरों के विरोधी थे। मूर्त्ति पूजा को लक्ष्य करती उनकी एक साखी है -
पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजौंपहार।
था ते तो चाकी भली, जासे पीसी खाय संसार।।
११९ वर्ष की अवस्था में मगहर में कबीर का देहांत हो गया। कबीरदास जी का व्यक्तित्व संत कवियों में अद्वितीय है। हिन्दी साहित्य के १२०० वर्षों के इतिहास में गोस्वामी तुलसीदास जी के अतिरिक्त इतना प्रतिभाशाली व्यक्तित्व किसी कवि का नहीं है।सनातन विचारों में उनकी आस्था रही ,
विवाह पूर्व संबंध अपराध नहीं
विवाह पूर्व संबंध अपराध नहीं
नई दिल्ली, प्रेट्र : सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लिव इन रिलेशनशिप (शादी से पहले साथ रहना) और यौन संबंध बनाना अपराध नहीं है। कोर्ट ने कहा कि कोई कानून दो बालिग लोगों को विवाह किए बगैर साथ रहने या यौन संबंध बनाने से नहीं रोक सकता। यह उनका अधिकार है। अदालत ने यह भी कहा कि पौराणिक हिंदू कथाओं के मुताबिक भगवान कृष्ण और राधा भी साथ रहते थे। तो क्या सभी भोगी बाबाओं को क़ानून माफ़ कर देगा ?
बुधवार, 24 मार्च 2010
मंगलवार, 23 मार्च 2010
गुरु की जिम्मेदारी कहानी
ब्रह्मदत्त जिन दिनों काशी राज्य पर शासन करते थे, बोधिसत्व ने तक्षशिला नगर में एक बड़े शिल्पाचार्य के रूप में जन्म लिया। उनके यहॉं शिल्प विद्या का अध्ययन करने के लिए देश के कोने-कोने से कई राजकुमार आया करते थे।
तक्षशिला नगर के शिल्पाचार्य का यश सुनकर काशी नरेश ने भी अपने पुत्र को विद्याभ्यास के लिए उनके यहॉं भेजने का निर्णय किया। लेकिन सोलह वर्ष से कम उम्रवाले राजकुमार को अकेले दूर स्थित तक्षशिला में भेजना और वहॉं गुरु की सेवा-शुश्रूषा करते शिक्षा प्राप्त करना मंत्री और सामंतों को कतई पसंद न था।
इस विचार से सब ने कहा, ‘‘महाराज, शिल्प विद्या के कई पंडित हमारे ही नगर में हैं; ऐसी हालत में युवराजा को तक्षशिला क्यों भेजते हैं?’’
पर राजा ने उनके सुझाव को न माना। उनका विचार था कि राजधानी में उनके पुत्र के लिए युवराजा के ओहदे पर रहते हुए शिल्प विद्या का अभ्यास करना मुमकिन न होगा।यों विचार कर राजा ने अपने पुत्र को एक जोड़ी खड़ाऊँ और ताड़-पत्रों वाला छाता मात्र देकर आदेश दिया, ‘‘तुम तक्षशिला जाकर वहॉं के शिल्पाचार्य के यहॉं शिक्षा प्राप्त करो। शिक्षा के समाप्त होते ही लौट आओ! उन्हें गुरु दक्षिणा के रूप में सौंपने के लिए एक हजार चांदी के सिक्के अपने साथ लेते जाओ।’’
राजकुमार अपने पिता के आदेशानुसार अकेले चल पड़ा। बड़ी तक़लीफ़ें झेलकर आख़िर वह तक्षशिला पहुँचा।युवराजा ने शिल्पाचार्य के दर्शन करके अपने आने का उद्देश्य बताया। एक हज़ार चांदी के सिक्के उन्हें सौंपकर उन्होंने विद्याभ्यास शुरू किया।
थोड़े दिन बीत गये। गुरु और शिष्य रोज सवेरे नगर के बाहर नदी में स्नान करने जाते थे। एक दिन जब वे दोनों नहा रहे थे, तब एक बूढ़ी औरत थोड़े तिल पानी में धोकर नदी किनारे एक वस्त्र पर सुखाने लगी।राजकुमार तिल को देखते ही झटपट स्नान पूरा करके किनारे पर पहुँचा। बूढ़ी को असावधान देख मुट्ठी भर तिल मुँह में डाल लिया। बूढ़ी ने इसे भांप लिया, लेकिन वह चुप रह गई।
दूसरे दिन भी राजकुमार ने ऐसा ही किया। बूढ़ी देखकर भी अनदेखी सी रह गई। तीसरे दिन भी राजकुमार ने मुट्ठी भर तिल खा लिया। इस पर बूढ़ी को उस युवक पर बड़ा गुस्सा आयाजब शिल्पाचार्य स्नान समाप्त कर नदी के किनारे पहुँचे, तब बूढ़ी औरत ने आचार्य से शिकायत की, ‘‘आचार्यजी, तीन दिन से बराबर आप का शिष्य मेरे तिल चुराकर खाता जा रहा है। तिल के नष्ट होने का मुझे दुख नहीं है, लेकिन उस युवक की चुराने की आदत मुझे अच्छी नहीं लगती। यह आप के यश में कलंक लगने की बात होगी। कृपया उसे ऐसा दण्ड दीजिए जिससे वह आइंदा ऐसी चोरी न करे।’’
घर लौटते ही शिल्पाचार्य ने राजकुमार की पीठ पर छड़ी से तीन बार मार कर कहा, ‘‘तुमने जो अनुचित कार्य किया है, उसके लिए यही सजा है! आइंदा तुम ऐसा काम बिलकुल न करो।’’राजकुमार को गुरु पर बड़ा क्रोध आया। लेकिन काशी राज्य की सीमा के बाहर वह एक साधारण व्यक्ति था, उसने सोचा। किन्तु उसने उसी व़क्त अपने मन में यह शपथ ली, ‘‘मेरे राजा बनने के बाद इस दुष्ट को किसी बहाने काशी राज्य में बुलवाकर जरूर इसकी जान ले लूँगा।’’कालक्रम में राजकुमार की शिक्षा समाप्त हुई। काशी लौटते व़क्त राजकुमार ने अपने गुरु को प्रणाम करके उनके आशीर्वाद लिये ।इसके बाद राजकुमार ने अपने गुरु से कहा, ‘‘आचार्यजी, मेरे राजा बनने के बाद आप को एक बार अवश्य काशी नगर में पधारना होगा। उस समय मैं उचित रीति से आपका सत्कार करना चाहता हूँ।’’ अपने शिष्य के निमंत्रण पर गुरु बहुत ख़ुश हुए और उन्होंने अपनी स्वीकृति दे दी।
काशी नगर को लौटने के थोड़े साल बाद राजकुमार का राज्याभिषेक हुआ। एक दिन उसे अपने गुरु की बात याद आई । उसी व़क्त उसने अपने एक नौकर को बुलाकर आज्ञा दी, ‘‘तुम तक्षशिला जाकर शिल्पाचार्य के दर्शन कर उन्हें मेरा यह निमंत्रण-पत्र सौंप दो।’’शिल्पाचार्य निमंत्रण पाकर भी तुरंत काशी के लिए रवाना न हुए। उन्होंने सोचा कि राजा गद्दी पाने के शौक में होगा। राज्य-भार का उसे अनुभव होने के बाद मिलना उचित होगा।इसी निर्णय के अनुसार शिल्पाचार्य थोड़े दिन बाद काशी नगर पहुँचे । राजा के गुरु के आने का समाचार सुनकर सभासदों ने शिल्पाचार्य के प्रति बड़ा आदर भाव दिखाया और उन्हें एक ऊँचे आसन पर बिठाया।
गुरु को देखते ही राजा को अपना पुराना क्रोध याद हो आया । उसने गुरु की ओर तीक्ष्ण दृष्टि डालकर पूछा, ‘‘मुट्ठी भर तिल खाने पर दण्ड देनेवाले को हाथ में आने पर कहीं प्राणों के साथ छोड़ दिया जाता है?’’
राजा ने सोचा कि सभासदों की समझ में न आनेवाले ढंग से शिल्पाचार्य के मन में मौत का डर पैदा कर फिर सुविधानुसार वह उसे मार डालेगा। लेकिन शिल्पाचार्य डरे नहीं। उल्टे उन्होंने राजा का रहस्य इस रूप में प्रकट किया, ‘‘हे राजन, जब तुम मेरी जिम्मेदारी के अधीन शिष्य थे, तब तुमने अपने ओहदे के विपरीत काम किया। शिष्य के दुष्टतापूर्ण व्यवहार पर दण्ड देकर उसे अच्छे पथ पर लाना गुरु का कर्तव्य है। अगर उस दिन मैंने तुम्हें दण्ड न दिया होता तो तुम आज राजा नहीं डाकू बन गये होते। बुद्धिमान लोग जब कोई अपराध करते हैं, तब वे दण्ड देनेवालों के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।’’
इस पर असली बात सभासदों पर प्रकट हो गई। राजा का अपमान हुआ। वह गुरु के पैरों पर गिरकर बोला, ‘‘महानुभाव, एक बार और आप ने मुझे गलत मार्ग से हटा कर सही रास्ते पर लगाया। मैं आप के प्रति हमेशा के लिए कृतज्ञ हूँ!’’ राजा के भीतर यह परिवर्तन देख सभासदों के साथ गुरु भी बहुत ख़ुश हुए।
इसके बाद राजा के अनुरोध पर शिल्पाचार्य ने अपना निवास तक्षशिला से काशी बदल लिया और दरबारी आचार्य के पद पर रहते हुए राजा को सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते रहे।
तक्षशिला नगर के शिल्पाचार्य का यश सुनकर काशी नरेश ने भी अपने पुत्र को विद्याभ्यास के लिए उनके यहॉं भेजने का निर्णय किया। लेकिन सोलह वर्ष से कम उम्रवाले राजकुमार को अकेले दूर स्थित तक्षशिला में भेजना और वहॉं गुरु की सेवा-शुश्रूषा करते शिक्षा प्राप्त करना मंत्री और सामंतों को कतई पसंद न था।
इस विचार से सब ने कहा, ‘‘महाराज, शिल्प विद्या के कई पंडित हमारे ही नगर में हैं; ऐसी हालत में युवराजा को तक्षशिला क्यों भेजते हैं?’’
पर राजा ने उनके सुझाव को न माना। उनका विचार था कि राजधानी में उनके पुत्र के लिए युवराजा के ओहदे पर रहते हुए शिल्प विद्या का अभ्यास करना मुमकिन न होगा।यों विचार कर राजा ने अपने पुत्र को एक जोड़ी खड़ाऊँ और ताड़-पत्रों वाला छाता मात्र देकर आदेश दिया, ‘‘तुम तक्षशिला जाकर वहॉं के शिल्पाचार्य के यहॉं शिक्षा प्राप्त करो। शिक्षा के समाप्त होते ही लौट आओ! उन्हें गुरु दक्षिणा के रूप में सौंपने के लिए एक हजार चांदी के सिक्के अपने साथ लेते जाओ।’’
राजकुमार अपने पिता के आदेशानुसार अकेले चल पड़ा। बड़ी तक़लीफ़ें झेलकर आख़िर वह तक्षशिला पहुँचा।युवराजा ने शिल्पाचार्य के दर्शन करके अपने आने का उद्देश्य बताया। एक हज़ार चांदी के सिक्के उन्हें सौंपकर उन्होंने विद्याभ्यास शुरू किया।
थोड़े दिन बीत गये। गुरु और शिष्य रोज सवेरे नगर के बाहर नदी में स्नान करने जाते थे। एक दिन जब वे दोनों नहा रहे थे, तब एक बूढ़ी औरत थोड़े तिल पानी में धोकर नदी किनारे एक वस्त्र पर सुखाने लगी।राजकुमार तिल को देखते ही झटपट स्नान पूरा करके किनारे पर पहुँचा। बूढ़ी को असावधान देख मुट्ठी भर तिल मुँह में डाल लिया। बूढ़ी ने इसे भांप लिया, लेकिन वह चुप रह गई।
दूसरे दिन भी राजकुमार ने ऐसा ही किया। बूढ़ी देखकर भी अनदेखी सी रह गई। तीसरे दिन भी राजकुमार ने मुट्ठी भर तिल खा लिया। इस पर बूढ़ी को उस युवक पर बड़ा गुस्सा आयाजब शिल्पाचार्य स्नान समाप्त कर नदी के किनारे पहुँचे, तब बूढ़ी औरत ने आचार्य से शिकायत की, ‘‘आचार्यजी, तीन दिन से बराबर आप का शिष्य मेरे तिल चुराकर खाता जा रहा है। तिल के नष्ट होने का मुझे दुख नहीं है, लेकिन उस युवक की चुराने की आदत मुझे अच्छी नहीं लगती। यह आप के यश में कलंक लगने की बात होगी। कृपया उसे ऐसा दण्ड दीजिए जिससे वह आइंदा ऐसी चोरी न करे।’’
घर लौटते ही शिल्पाचार्य ने राजकुमार की पीठ पर छड़ी से तीन बार मार कर कहा, ‘‘तुमने जो अनुचित कार्य किया है, उसके लिए यही सजा है! आइंदा तुम ऐसा काम बिलकुल न करो।’’राजकुमार को गुरु पर बड़ा क्रोध आया। लेकिन काशी राज्य की सीमा के बाहर वह एक साधारण व्यक्ति था, उसने सोचा। किन्तु उसने उसी व़क्त अपने मन में यह शपथ ली, ‘‘मेरे राजा बनने के बाद इस दुष्ट को किसी बहाने काशी राज्य में बुलवाकर जरूर इसकी जान ले लूँगा।’’कालक्रम में राजकुमार की शिक्षा समाप्त हुई। काशी लौटते व़क्त राजकुमार ने अपने गुरु को प्रणाम करके उनके आशीर्वाद लिये ।इसके बाद राजकुमार ने अपने गुरु से कहा, ‘‘आचार्यजी, मेरे राजा बनने के बाद आप को एक बार अवश्य काशी नगर में पधारना होगा। उस समय मैं उचित रीति से आपका सत्कार करना चाहता हूँ।’’ अपने शिष्य के निमंत्रण पर गुरु बहुत ख़ुश हुए और उन्होंने अपनी स्वीकृति दे दी।
काशी नगर को लौटने के थोड़े साल बाद राजकुमार का राज्याभिषेक हुआ। एक दिन उसे अपने गुरु की बात याद आई । उसी व़क्त उसने अपने एक नौकर को बुलाकर आज्ञा दी, ‘‘तुम तक्षशिला जाकर शिल्पाचार्य के दर्शन कर उन्हें मेरा यह निमंत्रण-पत्र सौंप दो।’’शिल्पाचार्य निमंत्रण पाकर भी तुरंत काशी के लिए रवाना न हुए। उन्होंने सोचा कि राजा गद्दी पाने के शौक में होगा। राज्य-भार का उसे अनुभव होने के बाद मिलना उचित होगा।इसी निर्णय के अनुसार शिल्पाचार्य थोड़े दिन बाद काशी नगर पहुँचे । राजा के गुरु के आने का समाचार सुनकर सभासदों ने शिल्पाचार्य के प्रति बड़ा आदर भाव दिखाया और उन्हें एक ऊँचे आसन पर बिठाया।
गुरु को देखते ही राजा को अपना पुराना क्रोध याद हो आया । उसने गुरु की ओर तीक्ष्ण दृष्टि डालकर पूछा, ‘‘मुट्ठी भर तिल खाने पर दण्ड देनेवाले को हाथ में आने पर कहीं प्राणों के साथ छोड़ दिया जाता है?’’
राजा ने सोचा कि सभासदों की समझ में न आनेवाले ढंग से शिल्पाचार्य के मन में मौत का डर पैदा कर फिर सुविधानुसार वह उसे मार डालेगा। लेकिन शिल्पाचार्य डरे नहीं। उल्टे उन्होंने राजा का रहस्य इस रूप में प्रकट किया, ‘‘हे राजन, जब तुम मेरी जिम्मेदारी के अधीन शिष्य थे, तब तुमने अपने ओहदे के विपरीत काम किया। शिष्य के दुष्टतापूर्ण व्यवहार पर दण्ड देकर उसे अच्छे पथ पर लाना गुरु का कर्तव्य है। अगर उस दिन मैंने तुम्हें दण्ड न दिया होता तो तुम आज राजा नहीं डाकू बन गये होते। बुद्धिमान लोग जब कोई अपराध करते हैं, तब वे दण्ड देनेवालों के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।’’
इस पर असली बात सभासदों पर प्रकट हो गई। राजा का अपमान हुआ। वह गुरु के पैरों पर गिरकर बोला, ‘‘महानुभाव, एक बार और आप ने मुझे गलत मार्ग से हटा कर सही रास्ते पर लगाया। मैं आप के प्रति हमेशा के लिए कृतज्ञ हूँ!’’ राजा के भीतर यह परिवर्तन देख सभासदों के साथ गुरु भी बहुत ख़ुश हुए।
इसके बाद राजा के अनुरोध पर शिल्पाचार्य ने अपना निवास तक्षशिला से काशी बदल लिया और दरबारी आचार्य के पद पर रहते हुए राजा को सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते रहे।
गुरुवार, 18 मार्च 2010
तलाक की प्रथा
सनातन धर्म में तलाक की प्रथा को बुरा माना जाता है .सात फेरों के बाद के तलाक में पुनः विवाह करने की इजाजत भी नही हें
एक पत्नी के होते दूसरी पत्नी लाने का भी कोई नियम नही है.इसे घटिया किस्म का कर्ममाना जाता है .
सनातन विचार को यदि देखा जावे तो सारी बात समझ में आ जाती है .जो सनातनी पुरुष पत्नी को त्यागता है वह पत्नी को धोखा देने का अपराधी बनता है .यदि वही पति दुबारा शादी कर लेता है तो उस पर व्यभिचारी होने को आरोप लगता है .यदि उस की पत्नी दूसरी शादी कर लेती है ,तो यह आरोप आत़ा हें की यह पुरुष अपनी पत्नी से व्यभिचार करवाता है
तलाक की नोबत तब आती है जब पत्नी को उस के मायके का ताना सुनना पड़े ...........................
कुंडली का सही मिलान नाहो ..........................................................................................
सही महूर्त पर फेरे ना हुए हों ..............................................................................................
शादी को एक सात्विक यज्ञ माना जाता है ,यदि इस यज्ञ में मदिरा और तामसी भोजन का प्रयोग हो तब भी यह दोष आत़ा है .
शादी में ली गयी शपथ को तोड़ने का भी यही दोष होता है.
शादी करवाने वाले ब्राह्मण से तकरार
बुधवार, 17 मार्च 2010
नयां दो दिन पुराना सो दिन
इस धरती पर दो ही परम्परा प्रचलन में रही हैं- ब्राह्मण और श्रमण। यह कहना कि ब्राह्मण परम्परा सर्वाधिक प्राचीन है तो बात अधूरी होगी और यह भी सही नहीं कि श्रमण पहले हुए। बस इतना समझ लें कि इन्हीं से ईश्वरवादी और अनिश्वरवादी धर्मों की उत्पत्ति हुई है।वास्तव में ब्रह्मा जिनको सृष्टि का निर्माता कहा जाता है .|वेद उन्ही की कस्टडी में रहे ,
चाहे हिंदू, पारसी, यहूदी, ईसाई, इस्लाम हो या फिर चर्वाक, जैन, शिंतो, कन्फ्युशियस या बौद्ध हो, आज धरती पर जितने भी धर्म हैं, उन सभी का आधार यही प्राचीन परम्परा रही है। इसी परम्परा ने वेद लिखे और इसी से जिनवाद की शुरुआत हुई। यही परम्परा आगे चलकर आज हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म कहलाती है।जैन-और बुध कोई धर्म धर्म नही थे यदि निष्पक्ष भाव से विचार किया जावे तो यह साबित हो जाता है की जैनियों के निर्माण करता भी वही ब्रह्मा जी ही रहे | हजारों वर्षों के इस सफर में इस परम्परा ने बहुत कुछ खोया और इसमें बहुत कुछ बदला गया। आज जिस रूप में यह परम्परा है यह बहुत ही चिंतनीय विषय होगा, उनके लिए जो इस परम्परा के जानकार हैं।
अरिष्टनेमि और कृष्ण तक तो यह परम्परा इस तरह साथ-साथ चली कि इनके फर्क को समझना आमजन के लिए कठिन ही था लेकिन बस यहीं से धर्म के व्यवस्थीकरण की शुरुआत हुई तो फिर सब कुछ अलग-अलग होता गया।जिनमे प्रमुख हिन्दू,मुस्लिम,सिख ,इसाई,ही सनातनी धर्म नजर आते हैं ,शेष सभी धर्मों को परिवर्तित धर्म कहा जा सकता है ,जिन को लेकर धर्म परिवर्तन की बहस होती है वही लोग धर्म परिवर्तन कर मिशन,समाज आदि आज भी बना रहे हैं
ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म को ही मोक्ष का आधार मानता हो और वेद वाक्य को ही ब्रह्म वाक्य मानता हो। ब्राह्मणों अनुसार ब्रह्म, और ब्रह्मांड को जानना आवश्यक है तभी ब्रह्मलीन होने का मार्ग खुलता है। श्रमण वह जो श्रम द्वारा मोक्ष प्राप्ति के मार्ग को मानता हो और जिसके लिए व्यक्ति के जीवन में ईश्वर की नहीं श्रम की आवश्यकता है। श्रमण परम्परा तथा संप्रदायों का उल्लेख प्राचीन बौद्ध तथा जैन धर्मग्रंथों में मिलता है तथा ब्राह्मण परम्परा का उल्लेख वेद, उपनिषद और स्मृतियों में मिलता है।
आज ब्राह्मण और श्रमण शब्द के अर्थ बदल गए हैं। यह जातिसूचक शब्द से ज्यादा कुछ नहीं। उक्त शब्दों को नहीं समझने के कारण अब इनकी गरिमा नहीं रही। दरअसल यह उन ऋषि-मुनियों की परम्परा या मार्ग का नाम था जिस पर चलकर सभी धर्म और जाति के लोगों ने मोक्ष को पाया। यह ऐसा ही है कि हम ऋषि और मुनि नाम की कोई जाति निर्मित कर लें और फिर उक्त शब्दों की गरिमा को भी खत्म कर दें।
यहाँ यह कहना भी जरूरी है कि उक्त दोनों परम्परा को जितना नुकसान इस परम्परा को मानने वालों से हुआ उतना ही नुकसान इस परम्परा को तोड़-मरोड़कर एक नई परम्परा को गढ़ने वालों से भी हुआ। इस सबके बीच कुछ लोग थे जिन्होंने उक्त परम्परा को उसके मूल रूप में बचाए रखा। अतः आज पुराने को मान ने की आवश्यकता है ,ना की नये की |कहावत भी तो है नयां दो दिन पुराना सो दिन |
अरिष्टनेमि और कृष्ण तक तो यह परम्परा इस तरह साथ-साथ चली कि इनके फर्क को समझना आमजन के लिए कठिन ही था लेकिन बस यहीं से धर्म के व्यवस्थीकरण की शुरुआत हुई तो फिर सब कुछ अलग-अलग होता गया।जिनमे प्रमुख हिन्दू,मुस्लिम,सिख ,इसाई,ही सनातनी धर्म नजर आते हैं ,शेष सभी धर्मों को परिवर्तित धर्म कहा जा सकता है ,जिन को लेकर धर्म परिवर्तन की बहस होती है वही लोग धर्म परिवर्तन कर मिशन,समाज आदि आज भी बना रहे हैं
ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म को ही मोक्ष का आधार मानता हो और वेद वाक्य को ही ब्रह्म वाक्य मानता हो। ब्राह्मणों अनुसार ब्रह्म, और ब्रह्मांड को जानना आवश्यक है तभी ब्रह्मलीन होने का मार्ग खुलता है। श्रमण वह जो श्रम द्वारा मोक्ष प्राप्ति के मार्ग को मानता हो और जिसके लिए व्यक्ति के जीवन में ईश्वर की नहीं श्रम की आवश्यकता है। श्रमण परम्परा तथा संप्रदायों का उल्लेख प्राचीन बौद्ध तथा जैन धर्मग्रंथों में मिलता है तथा ब्राह्मण परम्परा का उल्लेख वेद, उपनिषद और स्मृतियों में मिलता है।
आज ब्राह्मण और श्रमण शब्द के अर्थ बदल गए हैं। यह जातिसूचक शब्द से ज्यादा कुछ नहीं। उक्त शब्दों को नहीं समझने के कारण अब इनकी गरिमा नहीं रही। दरअसल यह उन ऋषि-मुनियों की परम्परा या मार्ग का नाम था जिस पर चलकर सभी धर्म और जाति के लोगों ने मोक्ष को पाया। यह ऐसा ही है कि हम ऋषि और मुनि नाम की कोई जाति निर्मित कर लें और फिर उक्त शब्दों की गरिमा को भी खत्म कर दें।
यहाँ यह कहना भी जरूरी है कि उक्त दोनों परम्परा को जितना नुकसान इस परम्परा को मानने वालों से हुआ उतना ही नुकसान इस परम्परा को तोड़-मरोड़कर एक नई परम्परा को गढ़ने वालों से भी हुआ। इस सबके बीच कुछ लोग थे जिन्होंने उक्त परम्परा को उसके मूल रूप में बचाए रखा। अतः आज पुराने को मान ने की आवश्यकता है ,ना की नये की |कहावत भी तो है नयां दो दिन पुराना सो दिन |
मंगलवार, 16 मार्च 2010
कुरान शरीफ हिन्दी में (Quraan in Hindi)
http://quran-in-hindi.blogspot.com/2009/05/quraan-in-hindi.html
एक मित्र का ब्लॉग
सूरह अल-बकरा
सूरह फ़ातिहा
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सूरह अल-बकरा
सूरह फ़ातिहा
आपकी क्या क्या राये हें मित्र
▼ 2009 (2) मुहम्मद (आप पर शान्ति हो) का परिचय: ▼ March (2)
मुहम्मद (आप पर शान्ति हो) के बारे में:
मुहम्मद (आप पर शान्ति हो) का परिचय:
▼ 2009 (2)
▼ March (2)
मुहम्मद (आप पर शान्ति हो) के बारे में:
मुहम्मद (आप पर शान्ति हो) का परिचय:
सोमवार, 15 मार्च 2010
सनातन धर्म का एक नियम यह भी देखें
सनातन धर्म का एक नियम यह भी देखें
छुआ-छूत की बात तो समझ में आती है,परन्तु जाती-पाती की बात समझ में नही आती यहीं देख कर कुछ समझ लो
यह जानवरों की जातियां आपस में प्रेम पूर्वक रह कर मोज-मस्ती कर रही हैं
और यह जाती खुद को महाराजा हरीश चन्द्र बताते नही थकते किसी ने इन की करतूतों से दुखी हो इन को यह उपाधि दे डाली है जिसे यह सरपर लगाये घूम रहे हैं
अब इस जाती को भी देखो दूसरों को नसीहत खुद की फ्सिह्त हम अपने कानून को नही मानते .तो हमारे लिए सनातन भगवान का कानून किस खेत की मुली है
छुआ-छूत की बात तो समझ में आती है,परन्तु जाती-पाती की बात समझ में नही आती यहीं देख कर कुछ समझ लो
यह जानवरों की जातियां आपस में प्रेम पूर्वक रह कर मोज-मस्ती कर रही हैं
और यह जाती खुद को महाराजा हरीश चन्द्र बताते नही थकते किसी ने इन की करतूतों से दुखी हो इन को यह उपाधि दे डाली है जिसे यह सरपर लगाये घूम रहे हैं
अब इस जाती को भी देखो दूसरों को नसीहत खुद की फ्सिह्त हम अपने कानून को नही मानते .तो हमारे लिए सनातन भगवान का कानून किस खेत की मुली है
रविवार, 14 मार्च 2010
सनातन धर्म में नारी
ओरत को पूजनीय होने का दर्जा सनातन धर्म ने दिया हुआ है ,कलयुग हे,ओरत को पसंद नही की उसे पूजा जावे ,वह तो अपनी स्तुति युगों-युगों से करवाने के पक्ष में रही है ,गीता का मजाक ही समझ लो ,क्या स्वार्थी मर्द किसी के हाथ में अपना घर परिवार सोंप सकता है? नही |परन्तु ओरत में ही वो शक्ति है जिसके वशीभूत हो मनुष्य उसे अपना सबकुछ देने को तयार हो जाता है उदाहरण के रूप में दादी माँ को ही देख लें ,घर की मालकिन होती है ,जब ओरत ही अपना सनातन संस्कार भूल गयी ,तब उसे अपना आप असुरक्षित नजर आने लगा .शादी के 7 फेरों में ओरत को ब्राह्मिण द्वारा शिक्षा दी जाती है की पति के शुभ कमों का आधा तुमको मिले गा पर पति के बुरे कर्मों में से तुमको भोगने के लिए कुछ नही मिले गा ओरत को यह बात नही पची ,पति शराबी कबाबी पहलेसे था नही था तो हो गया ,दुःख सुख के आने पर ओरत घबरा गयी ,अनाप शनाप धर्म गुरुओं की शरण जा पड़ी ,वहाँ भी उस को यही बतावा गया हो गा की पति ही परमेश्वर होता है ,वह फिर भी नही मानती कि पति परमेश्वर हो सकता है ,फिर जो हुआ बाबा लोग महिला केरूप कि आग में भस्म होने लगे , रामायण से यह सिखा जा सकता है कि अति कि सुन्दरता और पति से व्यर्थ कि जिद तथा देवर कि बात ना मानने से ही सीता जी का रावण ने अपहरण किया था ,मेरी समस्त धर्मों क़ी महिला साथियों से बनती हें ,अपनी अंतरात्मा क़ी आवाज सुने क्या वो सीता जेसी हैं?
तभी तो किसी ने कहा है
तू कोन है तेरा नाम है क्या , सिताभी यहाँ बदनाम हुई
यदि आज धर्म गुरु खुल कर कहने लगे हैं क़ी ओरत मन्दिर तीर्थ में अपने परिवारिक सदस्यों के साथ जाए, या ओरत अछे संस्कारों से युक्त बचे पैदा करे तो इन पड़े लिखे खुद को सभय कहने वाले समाज को दिक्त क्या है ?क्या वह ओरत को बेपर्दा कर उपरोक्त दोषों को आमंत्रित नही कर रहे ?
तभी तो किसी ने कहा है
तू कोन है तेरा नाम है क्या , सिताभी यहाँ बदनाम हुई
यदि आज धर्म गुरु खुल कर कहने लगे हैं क़ी ओरत मन्दिर तीर्थ में अपने परिवारिक सदस्यों के साथ जाए, या ओरत अछे संस्कारों से युक्त बचे पैदा करे तो इन पड़े लिखे खुद को सभय कहने वाले समाज को दिक्त क्या है ?क्या वह ओरत को बेपर्दा कर उपरोक्त दोषों को आमंत्रित नही कर रहे ?
शनिवार, 13 मार्च 2010
दो मित्रों की नोटंकी
ज्योतिष विद्या है कोई आध्यात्म नही संसार की हर विद्या को उस का पड़ा -लिखा विद्वान अपनी आयू के एक पडाव पर आ कर भूल जाता है ;परन्तु एक मात्र आध्यात्मिक विद्या ही ऐसी विद्या है जिस के द्वारा प्राप्त ज्ञान कभी भी समाप्त नही होता है ,पहली कक्षा में पड़ा गया क,ख,ग,दसवी बी.ऐ ,.एम .ऐ पड़ा लिखा भी भूल जाता है ,आज के विज्ञान और टेक्नालोजी को टी.वी पर शर्मशार होते दिखाया गया ,चंद पड़े -लिखे अन्पड ,इकठे हुए एक चेनल पर और बिना अपनी गिरेहबान में झांके उस सनातन ज्योतिस विद्या का मजाक बनाने लगे ,कार्य-क्रम कुछ इसी तरह आगे बड़ता है ,कुंडली का लाइव टेस्ट ,इस के लाइव टेस्ट को ज्योतिषी करते तो कुछ बात भी बनती उनको तो उन्ही की परीक्षा के लिए बुलाया गया था ,जो ज्योतिषी आये थे वह भी शायद चंद रुपयों की खातिर इस विद्या को बदनाम करने का ठेका कर के गये हुए थे ,यानी दो मित्रों की नोटंकी ,आधुनिक विज्ञान बनाम वह ज्योतिष विज्ञान जिसकी शोध पर सदियों से कोई कामही नही किया गया, मुर्ख विज्ञानी भयभीत हुआ खुद को इस ज्योतिष विद्या से सुचा सचा साबित करने पर तुला हुआ नजर आया ,और ग्रहों के ज्योतिषीय आधार को नकारता ही नजर आया .क्या आधुनिक विज्ञानिक विचार करगा ?
1 टिटनस-टोकसाइड के इंजेक्शन या रेबीज के इंजेक्शन एक विशेष टेम्प्रेचर पर रखे जाने चाहिए ,परन्तु निर्माता से बिक्रेता और फिर उप भोक्ता तक पहुचते पहुचते यह विज्ञान के नियमानुसार मृत्य हो जाता हें ,जिसको लगाना या लगवाना मुर्खता नही तो और क्या है?
इस लिए प्रिये आधुनिक विज्ञानिक भाइयो जरा विचार तो करो जिस के ज्योतिषीय विज्ञान का आप कोई मजाक बनाते है क्या उसी का कोई प्रभाव तो नही जो आप के एक्सपायर इंजेक्शन को लगवाने के बाद भी मनुष्य जाती का कोई अनिष्ट करने के योग्य नही रहता
2 मिलावट
3 अशुद्धता
क्या इन पर विचार की आपको आवश्यकता नही?
1 टिटनस-टोकसाइड के इंजेक्शन या रेबीज के इंजेक्शन एक विशेष टेम्प्रेचर पर रखे जाने चाहिए ,परन्तु निर्माता से बिक्रेता और फिर उप भोक्ता तक पहुचते पहुचते यह विज्ञान के नियमानुसार मृत्य हो जाता हें ,जिसको लगाना या लगवाना मुर्खता नही तो और क्या है?
इस लिए प्रिये आधुनिक विज्ञानिक भाइयो जरा विचार तो करो जिस के ज्योतिषीय विज्ञान का आप कोई मजाक बनाते है क्या उसी का कोई प्रभाव तो नही जो आप के एक्सपायर इंजेक्शन को लगवाने के बाद भी मनुष्य जाती का कोई अनिष्ट करने के योग्य नही रहता
2 मिलावट
3 अशुद्धता
क्या इन पर विचार की आपको आवश्यकता नही?
गुरुवार, 11 मार्च 2010
सनातन हिंदुत्व
सनातन हिंदुत्व
ईसामसीह ईसाई धर्म के प्रवर्तक हैं । हजरत मुहम्मद इस्लाम के पैगम्बर माने जाते हैं । किन्तु हिन्दुत्व का न तो कोई प्रवर्तक है और न ही पैगम्बर । हिन्दुत्व एक सनातन व्यवस्था है जिसमें विभिन्न मतों के सह-अस्तित्व पर बल दिया गया है । किसी को किसी एक पुस्तक में लिखी बातों पर ही विश्वास कर लेने के लिए विवश नहीं किया गया है । हिन्दू धर्म में फतवा जारी करने की कोई व्यवस्था नहीं है । यह उदारता और सहनशीलता पर आधारित धर्म है ।आदि काल से इसे ईश्वर ही स्थापित करते आये हैं चिन्तन मनन श्रवन द्वारा इस की पवित्र पुस्तकों के भाव को तत्व से जान्ने वालों को हिन्दू कहा गया है |
बुधवार, 10 मार्च 2010
गीता के अस्तित्व को खतरा
गीता के अस्तित्व को खतरा
वर्ण संकर पर मंडराता खतरा
अर्जुन द्वारा कही बातों को भी समझ ने की जरूरत हे अर्जुन का प्रश्न था कि अपने कुटुंब को मार कर केसे सुखी रह सकते हे ?और ख़ुद ही विचार भी करते हें लोभ -भ्रष्टचित हुए ये लोग ये लोग कुल के नाश उत्पन दोष और मित्र से विरोध करने में पाप को नही देखते (यही अभी हो रहा हे )कुल के नाश से उत्पन दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हट ने के लिए विचार क्यों नही कर न चाहिए ? आइये इसी पर पहले विचार किवा जाए ज्योतिष को वेदों का नेत्र कहा जाता हे ,वेदों के नेत्र का प्रयोग करने से पितृ दोष नजर में आता हे ,पत्र दोष में किसी ऐसे सम्बन्धी मित्र बन्धु-बांधव कि मृतु बाद प्राप्त जयेदाद जो उस के बाद हमे प्राप्त हो जाती हे भोगने से जो दोष आता हे ,इस दोष का उपचार जीव कि गति होने से ही होता हे जिस के लिए श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध और तर्पण कि प्रचलित विद्धि हे दोह्स उत्पन होने पर परिवार कि वृधी रुक जाती हे (आज हम -दो ,हमारे दो पारिवारिक वृधी ख़ुद ही रुक रही हे ) भयंकर दोष तो भारत में आ ही चुका हे आगे अर्जुन ख़ुद ही इस का जवाब देते हे कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हे धर्म के नाश से सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत बड जाते हें पाप बड़ने से कुल कि जनानियां दूषित हो जाती हें इन के खराब होने से परिवारों में (दोगले बचे पैदा होते हें )वर्ण -संकरता उत्पन हो ती हे वर्ण संकर कुल घातियों(इन गुरुओं-जो पति परमेश्वर के अधिकारों से पति को वंचित कर ख़ुद उस के अधिकारों को भोगता हे )और ऐसे कुल को नर्क में ले जाने के लिए काफी होता हे श्राद्ध-पिंड दान आदि से वंचित पितृ लोग अधोगति को प्राप्त हो जाते हे फिर वही पितृ तंग करते हें हम ढोंगी बाबाओं के चक्र में पड़अपना आप नाश कर लेते हें जिस-जिस का कुल धर्म नष्ट हो गया हे ऐसे मनुष्यों का अनिश्चित काळ तक नरकों में वास होता हे ऐसा हम सुना करते हें इस तरह के कटू सत्य को जान अर्जुन युद्घ के मैदान को हार कर त्यागने का मन बनाते हे वह भूल जाते हे कि जो भगवान के रथ पर रहते हें भगवान उन्ही कि मदद करते हें दुसरे अध्याये से भगवान अपना मुह खोल अर्जुन कि इस जिज्ञासा को शांत ही नही करते बलिक दर्शन भी देते हें (गीता)
प्रारम्भ करने से पहले अर्जुन कृष्ण को कह रहे थे ,नही कमाना राज्य ऐसा जिसमे सने खून से हाथ हों ,अपनों को मारू नही भाता ,क्यों नही अछा इससे पकड़ कटोरा भीख मांग लेता /नही करना युद्घ मुझ को इस से बेहतर रण में मरना होगा |गांडीव त्याग जब बेठ गया अर्जुन तब कृष्ण ने मुह खोला -----------------------हे अर्जुन तुझे असमय में ऐसा मोह क्यों हुआ ?क्यों की न तो श्रेष्ट पुरुषों द्वारा ऐसा होना चाहिये न इससे तेरी कीर्ति होगी न मिले गा स्वर्ग इस लिए मनकी कमजोरी को त्याग और युद्घ के लिए तयार हो|
वर्ण संकर पर मंडराता खतरा
अर्जुन द्वारा कही बातों को भी समझ ने की जरूरत हे अर्जुन का प्रश्न था कि अपने कुटुंब को मार कर केसे सुखी रह सकते हे ?और ख़ुद ही विचार भी करते हें लोभ -भ्रष्टचित हुए ये लोग ये लोग कुल के नाश उत्पन दोष और मित्र से विरोध करने में पाप को नही देखते (यही अभी हो रहा हे )कुल के नाश से उत्पन दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हट ने के लिए विचार क्यों नही कर न चाहिए ? आइये इसी पर पहले विचार किवा जाए ज्योतिष को वेदों का नेत्र कहा जाता हे ,वेदों के नेत्र का प्रयोग करने से पितृ दोष नजर में आता हे ,पत्र दोष में किसी ऐसे सम्बन्धी मित्र बन्धु-बांधव कि मृतु बाद प्राप्त जयेदाद जो उस के बाद हमे प्राप्त हो जाती हे भोगने से जो दोष आता हे ,इस दोष का उपचार जीव कि गति होने से ही होता हे जिस के लिए श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध और तर्पण कि प्रचलित विद्धि हे दोह्स उत्पन होने पर परिवार कि वृधी रुक जाती हे (आज हम -दो ,हमारे दो पारिवारिक वृधी ख़ुद ही रुक रही हे ) भयंकर दोष तो भारत में आ ही चुका हे आगे अर्जुन ख़ुद ही इस का जवाब देते हे कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हे धर्म के नाश से सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत बड जाते हें पाप बड़ने से कुल कि जनानियां दूषित हो जाती हें इन के खराब होने से परिवारों में (दोगले बचे पैदा होते हें )वर्ण -संकरता उत्पन हो ती हे वर्ण संकर कुल घातियों(इन गुरुओं-जो पति परमेश्वर के अधिकारों से पति को वंचित कर ख़ुद उस के अधिकारों को भोगता हे )और ऐसे कुल को नर्क में ले जाने के लिए काफी होता हे श्राद्ध-पिंड दान आदि से वंचित पितृ लोग अधोगति को प्राप्त हो जाते हे फिर वही पितृ तंग करते हें हम ढोंगी बाबाओं के चक्र में पड़अपना आप नाश कर लेते हें जिस-जिस का कुल धर्म नष्ट हो गया हे ऐसे मनुष्यों का अनिश्चित काळ तक नरकों में वास होता हे ऐसा हम सुना करते हें इस तरह के कटू सत्य को जान अर्जुन युद्घ के मैदान को हार कर त्यागने का मन बनाते हे वह भूल जाते हे कि जो भगवान के रथ पर रहते हें भगवान उन्ही कि मदद करते हें दुसरे अध्याये से भगवान अपना मुह खोल अर्जुन कि इस जिज्ञासा को शांत ही नही करते बलिक दर्शन भी देते हें (गीता)
प्रारम्भ करने से पहले अर्जुन कृष्ण को कह रहे थे ,नही कमाना राज्य ऐसा जिसमे सने खून से हाथ हों ,अपनों को मारू नही भाता ,क्यों नही अछा इससे पकड़ कटोरा भीख मांग लेता /नही करना युद्घ मुझ को इस से बेहतर रण में मरना होगा |गांडीव त्याग जब बेठ गया अर्जुन तब कृष्ण ने मुह खोला -----------------------हे अर्जुन तुझे असमय में ऐसा मोह क्यों हुआ ?क्यों की न तो श्रेष्ट पुरुषों द्वारा ऐसा होना चाहिये न इससे तेरी कीर्ति होगी न मिले गा स्वर्ग इस लिए मनकी कमजोरी को त्याग और युद्घ के लिए तयार हो|
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